सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा।
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा।
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा ।
रविवार, 15 नवम्बर 2009
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प्यास से जो खुद़ तड़प कर मर चुकी है वह नदी तो है मगर सूखी नदी है। तोड़कर फिर से समन्दर की हिदायत हर लहर तट की तरफ को चल पड़ी है।
शायर का नाम तो लिख देते गौतम जी ?
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खूब लिखा है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुंदर .....पहले भी .कहीं पढ़ा हुआ लगा ......!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंachchhe sher hain
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