मंगलवार, 12 जनवरी 2010

मैं खुद किसी महफ़िल से कम नहीं...

गौतम की तरह घर से निकल कर नहीं जाते
हम रात में छुपकर कहीं बाहर नहीं जाते



बचपन में किसी बात पर हम रूठ गए थे
उस दिन से इसी शहर में है घर नहीं जाते



एक उम्र यूँ ही काट दी फ़ुटपाथ पे रहकर
हम ऐसे परिन्दे हैं जो उड़कर नहीं जाते



उस वक़्त भी अक्सर तुझे हम ढूँढने निकले
जिस धूप में मज़दूर भी छत पर नहीं जाते



हम वार अकेले ही सहा करते हैं ‘राना’
हम साथ में लेकर कहीं लश्कर नहीं जाते

रविवार, 15 नवंबर 2009

दरिया...

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा।
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा।
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा ।

एक चेहरा...

एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं
किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं
शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद
मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

हमेशा के लिए !

निकल जाते हैं सपने
किसी अनन्त यात्रा पर
बार-बार की यातना से तंग आकर

गीली आँखें
बार-बार पोंछी जाएँ
सख्त हथेलियों से
तो चेहरे पर ख़राशें पड़ जाती हैं
हमेशा के लिए !

बुधवार, 24 जून 2009

जाने क्या चीज़ खो गई मेरी..?

आज तो बेसबब उदास है जी,
इश्क़ होता तो कोई बात भी थी,
जलता फिरता हूँ क्यूँ दो-पहरों में,
जाने क्या चीज़ खो गई मेरी?