एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं
किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं
शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद
मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं
रविवार, 15 नवम्बर 2009
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प्यास से जो खुद़ तड़प कर मर चुकी है वह नदी तो है मगर सूखी नदी है। तोड़कर फिर से समन्दर की हिदायत हर लहर तट की तरफ को चल पड़ी है।
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